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सोमवार, 30 नवंबर 2009

salaam


'सलाम'
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वो शाहे काइनात भी मुश्किल कुशा भी है
बिस्तर पे जो अली भी है ,खैरुल्वरा भी है

फर्शे अज़ा से इल्म की शम'आ जला के उठ
किरदारे शाह ज़हन की इक इर्तेक़ा भी है

इंसानियत के वास्ते जो इक सबक़ बनी
तारीख़ साज़ ऐसी कोई कर्बला भी है

ये मजलिसें मदरसा हैं यौमुल्हिसाब का
"ज़िक्रे हुसैन दर्द भी है और दवा भी है"

हर बेनवा ओ ,बेकस ओ ,तनहा के वास्ते
आबिद ज़बाँ है,आसरा है,रहनुमा भी है

तूफाँ जो आये खौफ का इमराज़ का कभी
हैदर का नाम क़ुवाते दिल भी 'शेफ़ा' भी है 

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

नात

ज़ाहिर हुई है सुब्ह नए आब-ओ-ताब की
दिखलाने आ गया कोई राहें सवाब की

है आखरी रसूल की आमद जहान में
कुर्बान खुद  को करती है खुशबू गुलाब की

ज़ुल्मत कदा था मुल्के अरब जहलो मक्र का
लाये रसूल रौशनी रब की किताब की 

ताज़ीम कर के फ़ातेमा की दरस दे दिया 
यूं कद्र होनी चाहिए इस्मत म -आब की


बेटी  की अहमियत को बयां इस तरह किया
रहमत है ये ,नहीं कोई गठरी अज़ाब  की

हो जब भी फ़िक्रो फ़ह्म की इल्मो अमल की बात
तस्वीर इक उभरती है बस बुतोराब

दह्शत्गरी से पाक है दीन-ए-मुहम्मदी
इंसानियत तो रूह है दीनी नेसाब की

मौजूद दरमियाँ हक-ओ-बातिल के है सेरात
मौला मुझे नज़र दे सही इंतेखाब की

रंगीनिये जहाँ में मिलेगा ना कुछ 'शेफ़ा'
तू उस पे चल जो राह है आलीजनाब की

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 की 





गुरुवार, 19 नवंबर 2009

कता
हक्कुल्यकीन की डोर अगर कास के थाम लें
तो मुश्किलें न राह में आने का नाम लें
ख़ाली न जाए दामने साएल, रहे ख़याल
हम मुर्तुज़ा के पंद -ओ -नसाएह से काम लें .

एक कता

एक कता
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जो मुझ को कुवते गोयाई तू ने की है अता
तो जुर अतेंभी अता कर कि सच को सच कह पाऊं
मैं इस गुनाह की बस्ती से चंद कम कर लूँ
जो राहे मीसमे तम्मार पे क़दम रख पाऊं
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