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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

मुतफ़र्रेक़ात

बसिल्सिल ए वेलादत ए इमाम हुसैन (अ.स.)

मुतफ़र्रेक़ात
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ज़िक्र जब छिड़ गया इबादत का 
लब पे नाम आ गया शहादत का
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हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये
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वतन को छोड़ना जंगल में आ के बस जाना
ये ग़म उठाए थे इस्लाम की बक़ा के लिए
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फ़र्श ए अज़ा से इल्म की शम’एं जला के उठ
किरदार ए शाह ज़ह्न की इक इरतेक़ा भी है
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इंसानियत के वास्ते जो इक सबक़ बनी
तारीख़साज़ ऐसी कोई करबला भी है?
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दहशत गरी से पाक है दीन ए मुहम्मदी
इंसानियत तो रूह है दीनी नेसाब की
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रोक ली शब्बीर ने तलवार जब आई नेदा
अए मुजाहिद तेरे इस सब्र ओ क़ेना’अत को सलाम
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