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शनिवार, 26 मार्च 2011

"दो शेर और एक  .कता" पेशे ख़िदमत है 
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 दो शेर 
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दरे इलाह पे जाना सुकूँ का बाइस है
दिल - ए - शिकस्ता की वाहिद पनाहगाह है ये  
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 जो आ रहे हैं अक़ीदत से उन  को आने दो 
 मेरे रसूल (स. अ.) की नज़रों में सब बराबर हैं 
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.कता 
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जो मुझ को क़ूवत ए गोयाई तूने की है अता
  तो  जुर्रतें भी अता कर कि सच को सच कह पाऊँ

मैं इस गुनाह की गठरी से चंद कम कर लूं 
 जो राह ए मालिक ए कौनैन पे  क़दम रख पाऊँ 
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