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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

........न हुआ, न है, न होगा

मेरे उस्ताद ए मोहतरम और भाई जनाब क़मरुल हसन ज़ैदी साहब ने मुझे ये रदीफ़ अता किया तो मैं ने हिम्मत कर डाली कुछ कहने की ,,मालूम नहीं ये हिम्मत कहाँ तक कामयाब है 

...........न हुआ, न है , न होगा
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कभी मुस्तफ़ा (स.अ.) सा तक़वा ,न हुआ, न है, न होगा
कोई अह्ल ए बैत (अ.स.) जैसा , न हुआ, न है, न होगा
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है मेरा हुसैन(अ.स.) मुझ से ,मैं हुसैन(अ.स.) से हूँ लोगो
ये यक़ीन और ये दावा , न हुआ , न है, न होगा
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तेरे इस जहाँ में मालिक मिले अनगिनत सहीफ़े
प किताब ए हक़ सा इजरा न हुआ, न है,न होगा
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यही हर क़दम पे साबित हुआ दश्त ए कर्बला में 
कि हुसैन(अ.स.) जैसा आक़ा , न हुआ, न है, न होगा
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ज़ह ए मनज़िलत कि चूमे थे क़दम जरी के उस ने 
कि फ़ुरात जैसा दरिया , न हुआ, न है, न होगा
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तेरी रहमतों से दामन है भरा हुआ ’शेफ़ा’ का
अदा तेरा शुक्र मौला , न हुआ, न है, न होगा
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तक़वा = परहेज़गारी , पवित्रता ; सहीफ़े = किताबें ;