फ़ॉलोअर

रविवार, 11 अप्रैल 2010

सलाम

एक सलाम हाज़िरे ख़िदमत है ,मुलाहेज़ा फ़रमाएं और अपनी दुआओं का साया बर्क़रार रखें ,शुक्रिया

'सलाम' 
___________________-

हुसैन लाए थे प्यारों को करबला के लिए
किया निसार उन्हें मर्ज़ी ए  ख़ुदा के लिए,

वतन को छोड़ना,जंगल में आ के बस जाना
ये ग़म उठाए थे इस्लाम की बक़ा के लिए

उधर हज़ारों का लश्कर इधर बहत्तर थे
हर एक काफ़ी था अफ़्वाज की फ़ना के लिए

बुझे चराग़ थे शब्बीर की इजाज़त थी
प नासेराने शहे दीं तो थे वफ़ा के लिए

तमांचे मारता था शिम्र नन्हे बच्चों को
मगर न हाथ उठा कोई बद दुआ के लिए

वो मां कि जिस का जनाज़ा उठा अंधेरे में
उसी की बेटियां मजबूर थीं रेदा के लिए

तड़प के बोली ये ज़ंजीरे आबिदे मज़लूम
मैं बद नसीब बनी तेरे दस्त ओ पा के लिए

सरे हुसैन था नेज़े पे,बे रेदा  कुनबा
प क़ैदियों को इजाज़त न थी बुका के लिए

कभी उमीद जो मादूम होने लगती है
अली का नाम ही क़ुवत है बस ’शेफ़ा’ के लिए

_____________________________________________________
निसार=बलिदान; बक़ा=हमेशा रहना; अफ़्वाज=फ़ौज का बहुवचन; नासिर=दोस्त; बुका=रोना;
नेज़े=भाले; दस्त ओ पा=हाथ पैर; मादूम=ख़त्म; रेदा = चादर(परदा)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

नात ए शरीफ़

एक ना’त ए शरीफ़ पेशे ख़िदमत है ,अगर आप को पुर असर मह्सूस हो तो दुआओं से नवाज़ कर शुक्र गुज़ार होने का मौक़ा अता फ़रमाएं
.
ना’त ए शरीफ़
_________________________
मेरे मौला तू बुला मुझ को कि दर देख सके 
ये गुनह्गार मुहम्मद का नगर देख सके

मुस्तफ़ा ख़ुल्क़ का हामी,है अमीनों का अमीं
तेरा हर राज़ अमानत ,तू अगर देख सके.

वो तो है नूर हर इक चश्म की ज़द से बाहर
जिस्म हासिल था उसे ,ताकि बशर देख सके

अपनी  उम्मत के लिये जिस ने दुआएं की थीं
और ये कोशिश थी उसे शीर ओ शकर देख सके 

न अदावत ,न शक़ावत , न रेज़ालत होगी 
तेरा किरदार जो दुनिया की नज़र देख सके 
-_____________________________________________
ख़ुल्क़ =अच्छा व्यवहार ; हामी = मानने वाला ; अमीन =अमानत रखने वाला,ईमानदार;
ज़द =लक्ष्य ;अदावत =दुशमनी ; शक़ावत =ज़ुल्म ; रेज़ालत =नीचता(व्यवहार की )




सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

naat e paak

जनाब शाहिद मिर्ज़ा 'शाहिद' साहब की कही हुई नात ए पाक मुलाहिज़ा फ़रमाएँ और इस मुक़द्दस नाम के सदके में दुआओं  से नवाज़ें ,शुक्रिया .
"नात ए पाक "
___________________

मोमिन की कसौटी है, किरदार मुहम्मद का
देखा है   मसीहा भी ,बीमार मुहम्मद का 

  उम्मत के लिए रब से बख्शिश की दुआ माँगी 
देखो तो जहाँ वालो ,ये प्यार मुहम्मद का 

कहते हो क़यामत तुम, मैं ईद समझता हूँ 
महशर में जो होना है दीदार मुहम्मद का 

सर अपने झुकाए हैं ,शाहों ने भी अज़मत को 
ऐसा है मदीने में दरबार मुहम्मद का 

गौहर से   बरसते हैं ,उस शख्स की आँखों से 
जो देख के आया हो घर बार मुहम्मद का

______________________________________________ 

शनिवार, 9 जनवरी 2010

सलाम 
__________________
मुस्लिमे ज़ीशान तेरी हर रेफाक़त को सलाम 
तेरे फ़ह्मो फ़िक्र में पिन्हाँ सदाक़त को सलाम 


बेअदब जो थी ज़ईफा हो गयी बीमार जब
की ख़बर गीरी मुहम्मद ,इस अयादत को सलाम 


मुफ़लिस ओ नादार को गंदुम की दे कर बोरियां 
ख़ुद किया फ़ाक़ा अली ,ऐसी केफालत को सलाम 


मुस्कुरा कर फ़तह की बेशीर ने जंगे अज़ीम 
काएदे तिफ्लाने आलम की क़यादत को सलाम 


ज़ुल्जनाहे शाह अस्पे बावफा तेरा ख़ुलूस
तू भी प्यासा ही रहा ,तेरी एआनत  को सलाम 


मुनहमिक सजदों में शह अहबाब थे सीना सिपर 
जाँ निसाराने शहे दीं की इबादत को सलाम 


रोक ली शब्बीर ने तलवार जब आई नेदा 
ऐ मुजाहिद तेरे इस सब्रो क़ेना अत को सलाम 


खानदाने हैदरी में हर कोई जर्रार था 
कर्बला वाले शहीदों की शहादत को सलाम 


अपने क़ातिल की बंधी मुश्कों को खुलवाकर 'शेफ़ा'
दे दिया इंसाफ़ को  मानी इमामत को सलाम 
-_________________________________________________ 





रविवार, 3 जनवरी 2010

सलाम
_________________
यूँ सभी पैग़म्बरों की ज़ाते आला और है
हैं रसूले पाक अफ़ज़ल उनका रुतबा और है

अकरुबा भूखे रहे साएल को रोटी दे दिया
ये है किरदारे अली बाक़ी की दुनिया और है

जब हुए अब्बास के बाज़ू क़लम इक शोर था 
बावफ़ा दुनिया में  ऐसा कोई देखा और है

यूँ तो इस दुनिया में तक़रीरें बहुत सब ने सुनीं
शाम के दरबार में ज़ैनब का ख़ुतबा और है

बाद मरने के तेरे बेटा ये माँ क्योंकर जिए
अब हुआ मालूम के मर मर के जीना और है

है क़लम हथियार मेरा उनका है तेग़ ओ तबर 
"मेरी दुनिया और है दुनिया की दुनिया और है "

"  " ये तरह दी गयी थी  

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

                                                                            सलाम
____________
तू इल्म के दरिया में शनावर की तरह है
और हुब्बे अली ही तेरे यावर की तरह है

वो जिस की बदौलत हैं ज़मीं आसमां रौशन
अब्बास तो इस्लाम के खावर की तरह है

बातिल की जो राहों पे चला मैं ने ये पाया
इक जिस्म नहीं रूह भी लागर की तरह है

शब्बीर पे सब बेटों की क़ुर्बानियाँ दे दीं
माँ क्या कोई अब्बास की मादर  की तरह है

इस दश्त में शाह लाये थे चुन चुन के वतन से
हर कोई यहाँ लाल ओ जवाहर की तरह है

किस तर्ह गुनाहों की तलाफ़ी हो 'शेफ़ा' अब
हर एक गुनह शजर ए तनावर की तरह है  


शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

क़सीदा
__________________

ख़ल्क़ में मीज़ाने नुज़हत हैं अली ओ फ़ातेमा 
बेशक़ीमत दीं की दौलत हैं अली ओ फ़ातेमा 

जिन की अज़मत के थे क़ायल ख़ुद रसूलल्लाह भी 
मुस्तफ़ा की वो बेज़ा,अत हैं अली ओ फ़ातेमा 

दे सके दुनिया को जो दरसे अखूवत ,दरसे दीं 
"इन्तेखाबे चश्मे क़ुदरत हैं अली ओ फ़ातेमा "*

आ के साएल दर पे ख़ाली हाथ ना लौटा कभी 
दूरिये आज़ारे ग़ुरबत हैं अली ओ फ़ातेमा 


जौ की सूखी रोटियां और आब थी उन की गेज़ा
मा'आनिये सब्रो क़ेना'अत हैं अली ओ फ़ातेमा 


ज़ुल्म सारे सह लिए ईमान पर क़ायम रहे 
बानिये किरदार ओ इस्मत हैं अली ओ फ़ातेमा 


बेकसो,लाचारो ,बेबस ,बेनवा के वास्ते
मुश्किलों में अब्रे रहमत हैं अली ओ फ़ातेमा 


उन का दर सब के लिए है हो वो सुल्तां या फ़क़ीर
वक्ते हाजत दस्ते शफ़क़त हैं अली ओ फ़ातेमा 

पेश की ऐसे मसावात ओ अखूवत की मिसाल 
इस जहाँ में वजहे उल्फ़त है अली ओ फ़ातेमा 


ज़िन्दगी में जब कोई मुश्किल पड़ी मुझ पर 'शेफ़ा'
मेरे सहमे दिल की ताक़त हैं अली ओ फ़ातेमा

________________________________________________
*  ये  मिसरा है  मेरा नहीं है बल्कि  ये तरह दी गयी 
थी .