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सोमवार, 24 जनवरी 2011

सलाम

"राह ए हक़"
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ज़ह्न ओ दिल में गर बसा लें मुस्तफ़ा का रास्ता
ख़ुद ब ख़ुद आए नज़र मुश्किल कुशा का रास्ता

इस तरह शब्बीर के किरदार का क़ाएल हुआ
आख़ेरश हुर छोड़ आया अश्क़िया का रास्ता

बेज़बां नन्हा सा फ़िदिया,, नौ’ए इन्सां ख़ुद चुने
असग़र ए(अ.स.)  ग़ुंचा दहन या हुर्मुला का रास्ता

कर के क़ब्ज़ा नह्र पर तिश्ना वो जब वापस हुआ
आ गया ताज़ीम को बढ़ कर वफ़ा का रास्ता

फूट कर पाओं के छाले रो दिये मज़लूम पर
बेकसी पे ज़ुल्म की इस इंतहा का रास्ता

इक जेहाद ए कर्बला है ,इक जेहाद ए शाम है
ये रह ए अब्बास (अ.स.) ,वो ज़ैनुलएबा (अ.स.) का रास्ता
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गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मुहर्रम के सिलसिले से चंद अश’आर पेश ए ख़िदमत हैं
अश्क ए अज़ा
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अल’अतश की थीं सदाएं प न पानी पहुंचा
सब्र वो देखा कि ख़ुद रह गया प्यासा पानी
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कहीं जो प्यास से बच्चा कोई तड़पता हो 
तसल्ली हो उसे तश्ना दहां की बात करें
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अल्लह के क़ुर्ब की है तमन्ना तुम्हें अगर
किरदार हो रसूल के अनसार की तरह
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नहीं ज़माने में ऐसा जरी कोई देखा
वफ़ाएं जिस की वफ़ा को सलाम करती हैं
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इस तरफ़ सिर्फ़ बहत्तर थे ,उधर थे लाखों
इस तरफ़ शेर अकेला उधर असवार बहुत
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न इज़न ए जंग मिला ,फिर भी जंग जीत लिया
’शेफ़ा’ ये मा’रेका अब्बास की शजा’अत है
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बुधवार, 24 नवंबर 2010

बस न जाने क्यों ज़ह्न में एक ख़याल आया और शेर में ढल गया
एक शेर 
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"मैं आसी हूं मगर दुनिया की तूने  ने’मतें  बख़्शीं
कहां से लाऊं शुक्राने  के मैं  अल्फ़ाज़ ऐ मौला"

बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

दो शेर

*दो शेर*
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मालिक तेरे अता ओ करम की नहीं है हद
ये दामन ए मुराद तो छोटा ही पड़ गया
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बख़्शे अब्बास ने अल्फ़ाज़ ओ ख़यालात मुझे
और मजालिस ने अता कर दिये जज़्बात मुझे

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शनिवार, 14 अगस्त 2010

इबादत

इबादत
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माह ए रमज़ान के मुक़द्दस मौक़े पर एक क़ता हाज़िरे ख़िदमत है 

ये चार दिन जो ख़ुदा ने अता किये हैं यहां 
इबादतों में गुज़ारो यही है राह ए अमां 
ये भूल जाओ कि कुछ नागवार गुज़रा था 
ख़ुलूस का ये समंदर भला मिलेगा कहां 

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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

मुतफ़र्रेक़ात

बसिल्सिल ए वेलादत ए इमाम हुसैन (अ.स.)

मुतफ़र्रेक़ात
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ज़िक्र जब छिड़ गया इबादत का 
लब पे नाम आ गया शहादत का
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हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये
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वतन को छोड़ना जंगल में आ के बस जाना
ये ग़म उठाए थे इस्लाम की बक़ा के लिए
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फ़र्श ए अज़ा से इल्म की शम’एं जला के उठ
किरदार ए शाह ज़ह्न की इक इरतेक़ा भी है
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इंसानियत के वास्ते जो इक सबक़ बनी
तारीख़साज़ ऐसी कोई करबला भी है?
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दहशत गरी से पाक है दीन ए मुहम्मदी
इंसानियत तो रूह है दीनी नेसाब की
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रोक ली शब्बीर ने तलवार जब आई नेदा
अए मुजाहिद तेरे इस सब्र ओ क़ेना’अत को सलाम
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शनिवार, 26 जून 2010

मन्क़बत
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वली अल्लाह ने जंगों में गर तेवर दिखाए हैं 
तो मज़दूरी भी की ,तालीम दी और दिल मिलाए हैं

मिली भूके को रोटी और यतीमों को मिली ढारस
कि बंदों के सभी ग़म ले के मौला मुस्कराए हैं

वो नाबीना जो इक उम्मीद में हर वक़्त रहता था
तो नासिर बन के हैदर नुसरत ए लाग़र को आए हैं

अली ए मुरतज़ा की बादशाहत किस तरह की थी
कभी फ़ाक़ा,कभी रोज़ा,निवाले सूखे खाए हैं

ख़तीब ए वक़्त भी, मुश्किल कुशा भी रहनुमा भी हैं
हर इक हाजत रवा करने मदद को आप आए हैं

कहां इन्कार करना है ,कहां इक़रार करना है
इमामत ने हमें ये राज़ ए दुनिया भी बताए हैं

दम ए नज़’अ भी क़ातिल की बंधी मुश्कों को खुलवाकर
अली ने रह्म और इंसाफ़ के नुसख़े बताए हैं