समर्थक

बुधवार, 24 नवंबर 2010

बस न जाने क्यों ज़ह्न में एक ख़याल आया और शेर में ढल गया
एक शेर 
_______________
"मैं आसी हूं मगर दुनिया की तूने  ने’मतें  बख़्शीं
कहां से लाऊं शुक्राने  के मैं  अल्फ़ाज़ ऐ मौला"

14 टिप्‍पणियां:

  1. इस्मत जी बहुत खूबसूरत शेर है। शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूबसूरत शेर है इस्मत साहिबा...
    और दो शेर याद दिला गया...
    1- तू अगर मुझे नवाज़े ये तेरा करम है वरना
    ...तेरी रहमतों का बदला मेरी बंदगी नहीं है
    और सईद खां सईद का ये शेर भी मुझे बहुत पसंद है-
    2- मेरे गुनाह की हद है तेरे करम की नहीं
    ...तू बख्श देता है छोटे से इक बहाने पर

    उत्तर देंहटाएं
  3. ये तो दिल से निकली एक सच्ची आवाज़ है इस्मत. सच है, उस सर्वशक्तिमान का शुक्रिया अदा करने के लिये शब्द हैं ही कहां हमारे पास?

    उत्तर देंहटाएं
  4. ब्लॉग पर आने का बहुत-बहुत शुक्रिया....बेहद खूबसूरत शे'र

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही खूबसूरत शब्‍द ...दिये हैं आपने इन पंक्तियों में ....।

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस्मत जी ,
    बहुत ही खूबसूरत शेर है !
    मुबारक हो !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही ख़ूबसूरत शेर है
    और इसी बहाने शाहिद मिर्ज़ा के भी दो शेर पढने को मिल गए
    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस्मत जी,
    नमस्कारम्‌!

    यह एक उम्दा शे’र है! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहद ख़ुबसुरती से ख़ुदा से ग़ुज़ारीश की है आपने!!!!

    उत्तर देंहटाएं