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मंगलवार, 7 मई 2013

कई माह के बाद एक हम्द ए पाक पेश ए ख़िदमत  है

हम्द ए बारि ए ता’ला
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ऐ मालिक ए सज़ा ओ जज़ा ,सादिक़ ओ अमीं
ऐ ख़ालिक़ ओ रहीम ओ वली ,रब्बुल आलमीं

दरिया, पहाड़ तूने बनाए जहान में
और वो परिंद उड़ते हैं जो आसमान में
इन्साँ को बख़्शी इल्म की दौलत क़ुरान में

ऐ मालिक ए सज़ा................................
ऐ ख़ालिक़ ओ रहीम.............................

जीने का हम को तूने सलीक़ा सिखा दिया
राह ए बहिश्त तेरे नबी(स.अ.) ने बता दिया 
तेरि रज़ा से ईसा ने मुर्दा जिला दिया

ऐ मालिक ए........................................
ऐ ख़ालिक़ ओ ....................................


वो दिन हो या कि रात नुमायाँ जगह जगह
हर शै में तेरी ज़ात नुमायाँ जगह जगह
मालिक तेरी सिफ़ात नुमायाँ जगह जगह

ऐ मालिक ए ........................................
ऐ ख़ालिक़ ओ .....................................


माँ , बाप ख़ानदान का साया दिया मुझे
सद शुक्र है कि माँ का भी रुतबा दिया मुझे
लौह ओ क़लम का क़ीमती तोहफ़ा दिया मुझे

ऐ मालिक ए .......................................
ऐ ख़ालिक़ ओ .....................................
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गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

चंद मिसरे पेश ए ख़िदमत है

ख़ुदा हाफ़िज़ ओ नासिर 
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ऐ आबिद ए बीमार  ख़ुदा हाफ़िज़ ओ नासिर
ऐ बेकस ओ ग़मख़्वार ख़ुदा हाफ़िज़ ओ नासिर
ऐ क़ाफ़िला सालार ख़ुदा हाफ़िज़ ओ नासिर
ऐ सब्र के मे’यार ख़ुदा हाफ़िज़ ओ नासिर


है ज़ब्त की ये कौन सी मंज़िल मेरे मौला

बाक़ी हैं अभी कितने मराहिल मेरे मौला

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मंगलवार, 24 जनवरी 2012

........न हुआ, न है, न होगा

मेरे उस्ताद ए मोहतरम और भाई जनाब क़मरुल हसन ज़ैदी साहब ने मुझे ये रदीफ़ अता किया तो मैं ने हिम्मत कर डाली कुछ कहने की ,,मालूम नहीं ये हिम्मत कहाँ तक कामयाब है 

...........न हुआ, न है , न होगा
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कभी मुस्तफ़ा (स.अ.) सा तक़वा ,न हुआ, न है, न होगा
कोई अह्ल ए बैत (अ.स.) जैसा , न हुआ, न है, न होगा
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है मेरा हुसैन(अ.स.) मुझ से ,मैं हुसैन(अ.स.) से हूँ लोगो
ये यक़ीन और ये दावा , न हुआ , न है, न होगा
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तेरे इस जहाँ में मालिक मिले अनगिनत सहीफ़े
प किताब ए हक़ सा इजरा न हुआ, न है,न होगा
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यही हर क़दम पे साबित हुआ दश्त ए कर्बला में 
कि हुसैन(अ.स.) जैसा आक़ा , न हुआ, न है, न होगा
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ज़ह ए मनज़िलत कि चूमे थे क़दम जरी के उस ने 
कि फ़ुरात जैसा दरिया , न हुआ, न है, न होगा
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तेरी रहमतों से दामन है भरा हुआ ’शेफ़ा’ का
अदा तेरा शुक्र मौला , न हुआ, न है, न होगा
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तक़वा = परहेज़गारी , पवित्रता ; सहीफ़े = किताबें ; 

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

एक मुसद्दस

एक मुसद्दस पेश ए ख़िदमत है l किसी तमहीद की ज़रूरत मुझे महसूस नही ं हो रही है बस आप की दुआएं और ध्यान चाहती हूं,,,,,शुक्रिया

"एक मुसद्दस "
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1
उन को मालूम था वापस वो नहीं आएंगे
उन को मालूम था बेटी से न मिल पाएंगे
क़ब्र ए नाना से हमेशा को बिछड़ जाएंगे
दफ़्न भी ख़ाक ए वतन में नहीं हो पाएंगे

फिर भी इस्लाम और उम्मत की बक़ा की ख़ातिर
आए वो कर्ब ओ बला राह ए ख़ुदा की ख़ातिर

2
एक ज़ालिम की सिपह तालिब ए बै’अत होगी
जानते थे वहाँ हर तर्ह शक़ावत होगी
जानते थे कि वहाँ फ़ौज ब कसरत होगी
जानते थे वहाँ हथियार की ताक़त होगी

पर यक़ीं अपने वफ़ादारों पे मासूम (अ.स.)को था
हाँ बहत्तर पे भरोसा शह ए मज़लूम (अ.स.)को था

3
सिर्फ़ गर्दन के कटाने को नहीं आए थे 
सिर्फ़ इक दश्त बसाने वो नहीं आए थे
सिर्फ़ दुनिया को दिखाने वो नहीं आए थे
सिर्फ़ घर बार लुटाने वो नहीं आए थे

वो तो लाए थे मुहम्मद (स.अ.) के मिशन का पैग़ाम
और दुनिया को बताया कि यही है इस्लाम 

4
बंद पानी की अज़ीयत शह ए दीं (अ.स.) सहते रहे
सुल्ह की कोशिशें भी शाह ए ज़मन (अ.स.) करते रहे
अपनी जानिब से न हमला हो यही कहते रहे
फिर भी ज़ालिम तलब ए बै’अत ए शर करते रहे

दामन ए सब्र भी ज़िनहार न छूटा शह (अ.स.)का
और बै’अत से भी इंकार न टूटा शह(अ.स.) का

5
हाँ ये इस्लाम की तारीख़ दिखाती है हमें
उन की फ़ितरत में था ईसार बताती है हमें
ज़ुल्म के बदले न हो ज़ुल्म ,सिखाती है हमें
नफ़्स पर क़ाबू रहे ,याद दिलाती है हमें

दौर ए हाज़िर में जो कहते हैं ,,जिहादी हैं वो
तोड़ कर दीं के उसूलों को फ़सादी हैं वो 

6
ज़ब्ते अब्बास (अ.स.) बताता है कि कैसे हो जेहाद 
लश्कर ए शाह (अ.स.) बताता है कि कैसे हो जेहाद
इक तबस्सुम ये बताता है कि कैसे हो जेहाद 
सब्र ए बीमार बताता है कि कैसे हो जेहाद

फिर जेहाद ऐसा हुआ और न जेहादी ऐसे 
कर्बला जैसी न थी जंग ,न ग़ाज़ी ऐसे 

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बक़ा =अमरत्व (eternity) ; सिपह = सेना ; तालिब ए बै’अत =  राजभक्ति (allegiance) चाहने वाला 
शक़ावत = क्रूरता ; ब कसरत = बहुत अधिक ; मज़लूम = जिस पर ज़ुल्म हुआ हो 
दश्त = जंगल ; अज़ीयत = तकलीफ़ ; ज़िनहार = किसी भी हाल में /कभी नहीं;
ईसार = बलिदान ; 

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

ek sher

एक शेर 
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इन्तहा ज़ुल्म की जब होगी 'शेफ़ा' दुनिया में 
देगा इंसाफ़ मेरे रब की अदालत का निज़ाम

रविवार, 7 अगस्त 2011

रोज़ा एक इबादत

रोज़ा एक इबादत
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जैसा कि आप सभी जानते हैं कि ये रमज़ान का मुक़द्दस और मुबारक महीना    
है और मैं इसी सिलसिले से आप के समक्ष कुछ विचार प्रस्तुत करना चाहती हूं ...पिछले दिनों अलग अलग अवसरों पर 
विभिन्न लोगों से मुलाक़ात हुई तो मुझे ये महसूस हुआ कि रमज़ान और रोज़ों के बारे में कुछ भ्रांतियां हैं जैसे_
-रोज़ा खोलने के पश्चात रोज़ेदार सहरी तक केवल खाता ही रहता है या
- रोज़े का अर्थ केवल खाना-पीना ही है या 
- रमज़ान में रोज़ेदार इतना खाते हैं कि वज़्न बढ़ जाता है और
- ये सारी बातें इस्लाम धर्म का हिस्सा हैं
परंतु जो भी व्यक्ति ऐसा समझता है उस में उस व्यक्ति की समझ का किंचित मात्र भी दोष नहीं है दोष तो उन का है जिन्होंने एक सार्थक और सामान्य सी प्रक्रिया को ग़लत रूप में संसार के सामने रखा है ,,,,इन भ्रांतियों के बारे में सुन कर मुझे महसूस हुआ कि ये मेरी भी ज़िम्मेदारी है कि सच्चाई सामने लाने वालों के साथ कुछ  मेरा भी योगदान हो .
रमज़ान इबादतों का एक पवित्र महीना है ,इस का ये मतलब कदापि नहीं कि साल भर हम इबादतें न करें बल्कि इस माह में रोज़ा एक अतिरिक्त इबादत है जो हम साल भर नहीं करते हैं .
रोज़े का अर्थ केवल खाने पीने से स्वयंको रोकना नहीं है बल्कि ये हमें अपनी इच्छाओं और भावनाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है जैसे क्रोध करना , किसी पर अत्याचार करना ,किसी का दिल दुखाना , किसी पर ग़लत नज़र डालना आदि
मैं ये मानती हूं कि कुछ लोग दिन भर की भूख प्यास के बाद इफ़्तार के समय बहुत अधिक और गरिष्ठ भोजन करते हैं 
लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिये ,,इस्लाम के अनुसार रोज़ा हमें नियमित जीवन से अलग नहीं करता बल्कि उन लोगों के दुख का एह्सास कराता है जिन का जीवन अभावों से घिरा हो ताकि हम अल्लाह की अ’ता की हुई ने’मतों का ग़लत इस्तेमाल न करें ,,,,इसलिये आवश्यकता से अधिक खाना पीना रोज़े के मक़सद को ख़त्म कर देता है .
मुहम्मद (स.अ.)साहब और उन के चाहने और मानने वाले जौ की सूखी रोटियों से इफ़्तार किया करते थे और यदि उस समय कोई याचक द्वार पर होता तो वह सूखी रोटी भी उसे दे कर ख़ुद भूखे रहते थे ,,इफ़्तार का अर्थ है रोज़ा
खोलना ,,रोज़ा किसी भी चीज़ से खोला जा सकता है लेकिन  रसूल अल्लाह (स.अ.) खजूर या नमक या गर्म पानी से ही रोज़ा खोलते थे ,तो यदि हमें उन के बताए हुए रास्तों पर चलना है तो इफ़्तार में आवश्यकता से अधिक खाना पीना ,,ईद पर बहुत अधिक ख़र्च करना जैसी चीज़ों को त्यागना होगा बल्कि जितने अधिक पुण्य के काम हम कर सकते हों करें और इस भावना को निरंतर आजीवन बनाए रखें ,,
धर्म को धर्म की तरह अपने जीवन में धारण करने के बजाय उस का ग़लत इस्तेमाल किसी भी तरह जायज़ नहीं ,,धर्म जीवन को 
अनुशासित करता है ,,सीधी सच्ची राह पर चलने की ताकीद करता है न कि जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों को त्यागने की ,,,,शायद मेरा ये प्रयास कुछ लोगों की ग़लतफ़हमी दूर कर सके .
धन्यवाद !!

शनिवार, 26 मार्च 2011

"दो शेर और एक  .कता" पेशे ख़िदमत है 
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 दो शेर 
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दरे इलाह पे जाना सुकूँ का बाइस है
दिल - ए - शिकस्ता की वाहिद पनाहगाह है ये  
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 जो आ रहे हैं अक़ीदत से उन  को आने दो 
 मेरे रसूल (स. अ.) की नज़रों में सब बराबर हैं 
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.कता 
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जो मुझ को क़ूवत ए गोयाई तूने की है अता
  तो  जुर्रतें भी अता कर कि सच को सच कह पाऊँ

मैं इस गुनाह की गठरी से चंद कम कर लूं 
 जो राह ए मालिक ए कौनैन पे  क़दम रख पाऊँ 
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