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गुरुवार, 19 नवंबर 2009

कता
हक्कुल्यकीन की डोर अगर कास के थाम लें
तो मुश्किलें न राह में आने का नाम लें
ख़ाली न जाए दामने साएल, रहे ख़याल
हम मुर्तुज़ा के पंद -ओ -नसाएह से काम लें .

3 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ अभिवादन! दिनों बाद अंतरजाल पर! न जाने क्या लिख डाला आप ने! सुभान अल्लाह! खूब लेखन है आपका अंदाज़ भी निराल.खूब लिखिए. खूब पढ़िए!

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