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सोमवार, 30 नवंबर 2009

salaam


'सलाम'
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वो शाहे काइनात भी मुश्किल कुशा भी है
बिस्तर पे जो अली भी है ,खैरुल्वरा भी है

फर्शे अज़ा से इल्म की शम'आ जला के उठ
किरदारे शाह ज़हन की इक इर्तेक़ा भी है

इंसानियत के वास्ते जो इक सबक़ बनी
तारीख़ साज़ ऐसी कोई कर्बला भी है

ये मजलिसें मदरसा हैं यौमुल्हिसाब का
"ज़िक्रे हुसैन दर्द भी है और दवा भी है"

हर बेनवा ओ ,बेकस ओ ,तनहा के वास्ते
आबिद ज़बाँ है,आसरा है,रहनुमा भी है

तूफाँ जो आये खौफ का इमराज़ का कभी
हैदर का नाम क़ुवाते दिल भी 'शेफ़ा' भी है 

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8 टिप्‍पणियां:

  1. इंसानियत के वास्ते जो इक सबक़ बनी
    तारीख़ साज़ ऐसी कोई कर्बला भी है
    बहुत सुन्दर.

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  2. *misbah,shukriya,lekin tum logon se tanqeed ki ummeed rakhte hain .ab to tumhari jaan nahin chhootegi.

    *vandana,is blog par bhi tumhen dekh kar bahut achchha laga .shukriya kahna to mana hai .

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  3. मोहतरमा इस्मत साहिबा,
    अल्लाह आपके जज्बे को हमेशा कायम रखे
    और हम जैसे गुनाहगार भी फैज़याब होते रहें.
    (आमीन)
    यहां तन्कीद की गुंज़ाइश नहीं
    मिस्बाह साहब, और सभी हज़रात से यही गुज़ारिश है-
    ज़िक्रे-रसूले-पाक पे इतना रहे ख्याल
    मोमिन तेरे लबों पे दरूद-ओ-सलाम हो
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  4. Kya gazab urdudaan hain aap! Wah..maza aa gaya padhke...apnee maa zaroor padhwaungee aapka blog!

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  5. shahid sahab bahut khoob ,bahut achcha sher hai ,unka naam lena hi sawab hai
    dua ke liye shukriya

    shama saheba ap ko apne blog par dekh kar khushi hui,agar apki waleda ne ye blog padha to un se darkhwast kijiyega ki wo mere liye dua karen

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  6. Bajjo - hamse tanqeed kee ummeed mat rakhyega kyon ki hum is qabil nahin hain. Yeh kaam bhaiyya aur bhaijan ke liye hai. Hum to unme se hain ki agar samajh main aa gaya to wah wah warna khamosh rahte hain ki shayad hamari samajh main nahin aya. Aap ki shayari Masha Allah, asaan zaban, achhi fikr or zameen par mabni hai is liye achhee lagti hai.
    KH
    Misbah

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  7. ये मजलिसें मदरसा हैं यौमुल्हिसाब का

    "ज़िक्रे हुसैन दर्द भी है और दवा भी है"
    माशाल्लाह

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