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रविवार, 11 अप्रैल 2010

सलाम

एक सलाम हाज़िरे ख़िदमत है ,मुलाहेज़ा फ़रमाएं और अपनी दुआओं का साया बर्क़रार रखें ,शुक्रिया

'सलाम' 
___________________-

हुसैन लाए थे प्यारों को करबला के लिए
किया निसार उन्हें मर्ज़ी ए  ख़ुदा के लिए,

वतन को छोड़ना,जंगल में आ के बस जाना
ये ग़म उठाए थे इस्लाम की बक़ा के लिए

उधर हज़ारों का लश्कर इधर बहत्तर थे
हर एक काफ़ी था अफ़्वाज की फ़ना के लिए

बुझे चराग़ थे शब्बीर की इजाज़त थी
प नासेराने शहे दीं तो थे वफ़ा के लिए

तमांचे मारता था शिम्र नन्हे बच्चों को
मगर न हाथ उठा कोई बद दुआ के लिए

वो मां कि जिस का जनाज़ा उठा अंधेरे में
उसी की बेटियां मजबूर थीं रेदा के लिए

तड़प के बोली ये ज़ंजीरे आबिदे मज़लूम
मैं बद नसीब बनी तेरे दस्त ओ पा के लिए

सरे हुसैन था नेज़े पे,बे रेदा  कुनबा
प क़ैदियों को इजाज़त न थी बुका के लिए

कभी उमीद जो मादूम होने लगती है
अली का नाम ही क़ुवत है बस ’शेफ़ा’ के लिए

_____________________________________________________
निसार=बलिदान; बक़ा=हमेशा रहना; अफ़्वाज=फ़ौज का बहुवचन; नासिर=दोस्त; बुका=रोना;
नेज़े=भाले; दस्त ओ पा=हाथ पैर; मादूम=ख़त्म; रेदा = चादर(परदा)

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।



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  2. मोहतरमा इस्मत साहिबा, आदाब
    जिस जज़्बे के साथ आपने सलाम पेश किये हैं,
    उस जज़्बे को सलाम...
    बुझे चराग़ थे शब्बीर की इजाज़त थी
    प नासेराने शहे दीं तो थे वफ़ा के लिए

    तमांचे मारता था शिम्र नन्हे बच्चों को
    मगर न हाथ उठा कोई बद दुआ के लिए

    वो मां कि जिस का जनाज़ा उठा अंधेरे में
    उसी की बेटियां मजबूर थीं रेदा के लिए

    तड़प के बोली ये ज़ंजीरे आबिदे मज़लूम
    मैं बद नसीब बनी तेरे दस्त ओ पा के लिए

    बस आंखें नम हो जाती हैं.हर शेर पर
    ...कुछ कहते नहीं बनता.
    मुबारकबाद कबूल फ़रमायें

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  3. इस्मत, मैं जब भी यहां आती हूं, तो कुछ बोलने को जी नहीं चाहता.चुपचाप पूरी रचना को आत्मसात करने का मन होता है.

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  4. तमांचे मारता था शिम्र नन्हे बच्चों को
    मगर न हाथ उठा कोई बद दुआ के लिए

    वो मां कि जिस का जनाज़ा उठा अंधेरे में
    उसी की बेटियां मजबूर थीं रेदा के लिए

    dil se likhee nazm dil ko choo gayee..... bemisaal .

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  5. मोहतरमा इस्मत जी
    सीरत ए मुस्तकीम के दर पर आया ................
    कभी उमीद जो मादूम होने लगती है
    अली का नाम ही क़ुवत है बस ’शेफ़ा’ के लिए
    ...........क्या शानदार लिखा है आपने......
    हजारों दाद क़ुबूल फरमाएं

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  6. सलाम,जज़ाकल्लाह ,यह हुनर हम लोगून से कहां छुपा रेखा था. यह सलाम पढ़ के आप के फेन को सलाम करने का दिल करता है.
    Beyond my expectation.
    S.M.MAsum
    9823403494

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  7. urdu lafzon ka gyaan alp hai..par haan jahan bhi inse lablabayi nazm milti hai..padhkar accha lagta hai.. :)

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  8. हुसैन लाए थे प्यारों को करबला के लिए
    किया निसार उन्हें मर्ज़ी ए ख़ुदा के लिए,

    वतन को छोड़ना,जंगल में आ के बस जाना
    ये ग़म उठाए थे इस्लाम की बक़ा के लिए

    aap की पकड़ उर्दू और हिंदी ज़बान पे बेहतरीन है
    S.M.MAsum

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  9. Ismat ji pehali bar aapke blog par aaee. Aapne to karbala ka pooramanjar pesh kar diya. Bahut badhiya.

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  10. मुहतरमा इस्मत, आपके सलाम का ये शेर इन्तेहाई त'अस्सुर-आमेज़ है-तड़पके बोली ये ज़जीरे-आबिदे-मज़लूम / मैं बदनसीब बनी तेरे दस्तो-पा के लिए॥एक शेर बेसाख़्ता ज़बान पर आ गया-
    अज़ल से क़ल्बे-बशर पर है नक़्श ये तहरीर,
    मिला है जिस्मे-बशर शरहे-कर्बला के लिय्॥
    मेरी दुआएं क़ुबूल कीजिए।

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  11. वो मां कि जिस का जनाज़ा उठा अंधेरे में
    उसी की बेटियां मजबूर थीं रेदा के लिए
    लाजवाब शेर उर्दू शब्दों के अर्थ देख कर बहुत अच्छा लगा शायद पहली बार यहाँ आयी हूँ युग विमर्श से देख कर। वहाँ आपकी टिप्पनियों से बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

    तड़प के बोली ये ज़ंजीरे आबिदे मज़लूम
    मैं बद नसीब बनी तेरे दस्त ओ पा के लिए
    शेर के भाव तो समझ आ गये मगर आबिदे मजलूम के अर्थ भी लिख देते तो अच्छा था। गज़ल के क्या कहने धन्यवाद्

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