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शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

मुतफ़र्रेक़ात

बसिल्सिल ए वेलादत ए इमाम हुसैन (अ.स.)

मुतफ़र्रेक़ात
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ज़िक्र जब छिड़ गया इबादत का 
लब पे नाम आ गया शहादत का
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हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये
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वतन को छोड़ना जंगल में आ के बस जाना
ये ग़म उठाए थे इस्लाम की बक़ा के लिए
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फ़र्श ए अज़ा से इल्म की शम’एं जला के उठ
किरदार ए शाह ज़ह्न की इक इरतेक़ा भी है
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इंसानियत के वास्ते जो इक सबक़ बनी
तारीख़साज़ ऐसी कोई करबला भी है?
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दहशत गरी से पाक है दीन ए मुहम्मदी
इंसानियत तो रूह है दीनी नेसाब की
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रोक ली शब्बीर ने तलवार जब आई नेदा
अए मुजाहिद तेरे इस सब्र ओ क़ेना’अत को सलाम
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17 टिप्‍पणियां:

  1. इमाम हुसैन (अ.स) का जन्म दिन मुबारक.
    रोक ली शब्बीर ने तलवार जब आई नेदा
    अए मुजाहिद तेरे इस सब्र ओ क़ेना’अत को सलाम

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  2. बहुत देर से मुबारकबाद देने आई हूं....मुबारक हो.
    हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
    दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये
    क्या कहूं? चुपचाप आत्मसात कर रही हूं.

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  3. दहशत गरी से पाक है दीन ए मुहम्मदी
    इंसानियत तो रूह है दीनी नेसाब की
    इस्मत साहिबा......
    मुबारक....मुबारक.....मुबारक
    आपके क़लम....
    आपके..कलाम को एक बार फिर सलाम

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  4. हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
    दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये .
    Wah Wah .

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  5. हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
    दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये
    bahut khoob...
    bahut sunder laga..

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  6. KHOOBSOORAT POST.. KATHIN SHABDO KE HINDI ARTH BHI DIYE RAHTE , TO AUR ACHHA HOTA...

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  7. बहुत देर से ही सही मुबारक कबूल कर लीजिये। कई दिन से नेट से दूर थी। बहुत बहुत मुबारक ।

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  8. हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
    दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये
    ..बहुत खूब.

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  9. namaste ji. aapko padhne ke liye mujhe kaffi mehanat karani padi.urdu shabdonko mai bahut kam janti hon.vyse mere blog par padharneka bahut bahut shukriya.........

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  10. मुबारक हो , मुबारक हो , बहुत बहुत मुबारक हो ।
    रमजान मुबारक हो ।

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  11. आप सब का बहुत बहुत शुक्रिया
    अल्पना जी इस दुआ की बहुत ज़रूरत है

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  12. mubaarak ho mubarak ho.. har din khuda ki ibadat me gujre .. har sher umdaa... bahut khoob..

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  13. Ismat jee aapse gujarish hai ki mushkil shabdon ke arth de diya karen to hum jaise bhee uska asali lutf utha payen
    हो कोई ज़ात,कोई क़ौम या गिरोह कोई
    दरे इमाम खुला है हर इक नफ़स के लिये
    this one went to heart.

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