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शनिवार, 14 अगस्त 2010

इबादत

इबादत
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माह ए रमज़ान के मुक़द्दस मौक़े पर एक क़ता हाज़िरे ख़िदमत है 

ये चार दिन जो ख़ुदा ने अता किये हैं यहां 
इबादतों में गुज़ारो यही है राह ए अमां 
ये भूल जाओ कि कुछ नागवार गुज़रा था 
ख़ुलूस का ये समंदर भला मिलेगा कहां 

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25 टिप्‍पणियां:

  1. एक अच्छी पोस्ट लिखी है आपने ,शुभकामनाएँ और आभार

    आदरणीय
    हिन्दी ब्लाँगजगत का चिट्ठा संकलक चिट्ठाप्रहरी अब शुरु कर दिया गया है । अपना ब्लाँग इसमे जोङकर हिन्दी ब्लाँगिँग को उंचाईयोँ पर ले जायेँ

    यहा एक बार चटका लगाएँ


    आप का एक छोटा सा प्रयास आपको एक सच्चा प्रहरी बनायेगा

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  2. Bahut sundar! Ramzaan mubarak ho!
    Deshki azaadi ke parv pe dheron shubhkamnayen!

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  3. बहुत अच्छा और नसीहत भरा क़ता है...
    रमज़ान की मुबारकबाद.

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  4. मुबारक रमज़ान की हार्दिक बधाई

    पाकीज़गी से लबरेज़ कअता पढवाने के लिये शुक्रिया

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  5. ये भूल जाओ कि कुछ नागवार गुज़रा था
    ख़ुलूस का ये समंदर भला मिलेगा कहां

    good!!!!!!!

    ramjaan mubaarak...

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  6. आप सब को भी रमज़ान शरीफ़ मुबारक हो
    बहुत बहुत शुक्रिया

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  7. ramzaan mubaarak ho...

    maaf kijiyega khuloos ka matlab mujhe nahi pataa...

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  8. bahut hi khoob likha hai aapne.

    Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

    A Silent Silence : Ye Kya Hua...

    Banned Area News : Blair O Neal

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  9. bahut sundar, pyaar ke is saamandar kee ore bahut kam logon kee najaren jaatee hain.

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  10. AAPKO RAMJAAN KI MUBARAKBAAD , AAPNE ITNI ACCHI TARAH SE BAAT KI HAI ,KI EK RUHANI JUNOON CHA GAYA PADHKAR AAPKO .. MERA SALAAM KABUL KARE..

    VIJAY
    आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. काश लोग जो कहते हैं वोह करते भी तो आज कितना सुकून होता ज़िंदगी मैं..

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  13. अज आप मेरे ब्लाग पर आयीं मै धन्य हो उठी। बहुत बहुत शुभकामनाये।
    आपकी गज़ल या किसी भी रचना पर कुछ कहने जितना कद नही फिर भी गुस्ताखी कर देती हूँ---
    ये भूल जाओ कि कुछ नागवार गुज़रा था
    ख़ुलूस का ये समंदर भला मिलेगा कहां
    लाजवाब ।

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  14. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  15. आदरणीय इस्मत जी
    बहुत खूब,बहुत सुन्दर.आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आयी .पर देर आयी दुरुस्त आयी .

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  16. Ismat jee bahut Khoobsurat salah hai ramjan ke mah men ye aapki.

    ये भूल जाओ कि कुछ नागवार गुज़रा था
    ख़ुलूस का ये समंदर भला मिलेगा कहां
    Kash hum bhool jayen nagwar baton ko.

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